कुंडलिनी kundlini

कुण्डलिनी जब उठती है तो स्वर उत्पन्न करती है, सभी स्वरों के अलग अलग अर्थ होते हैं । और चक्रो पर जो स्वर सुनाई देते हैं उनका उच्चारण इस प्रकार है-


1- मूलाधार:- चार पंखुडियॉ , चार स्वर उतपन्न होते हैं।

 व, श, ष, स- मंत्र – लं ‘ 

2-स्वादिष्ठान:- छः पंखुडियॉ , छः स्वर उतपन्न होते हैं।

 ब, भ, म, य, र, ल - मंत्र- ‘ वं ‘

3- मणिपुर :- दस पंखुडियॉ , दस स्वर उत्पन्न होते हैं ।

ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ -- मंत्र – ‘ रं ‘

4-अनाहत चक्र :- बारह पंखुडियॉ , बारह स्वर उत्पन्न होते हैं ।

क, ख, ग, घ, ड. च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ – मंत्र – ‘ यं ‘ 

5-विशुद्धि चक्र:- सोलह पंखुडियॉ, सोलह स्वर उत्पन्न होते हैं।

अ,आ, इ, ई, उ, ऊ,ऋं ,ॠं,ळं ,लृं,ए,ऐ,ओ,औं ,अं,अः - मंत्र- 'हं'

6-आज्ञा चक्र :- दो पंखुडियॉ >>दो स्वर उत्पन्न होते हैं।

 ह, क्ष - मंत्र – ‘ ॐ ‘

अपने मस्तिष्क द्वारा आप दिव्यता के विषय में कुछ नहीं जान पाते हैं। जब तक कुण्डलिनी इस भाग में नहीं पहुंच जाती या जब तक आत्मा का प्रकाश मस्तिष्क में चमकने न लग जाय..किसी व्यक्ति की दिव्यता जान पाना कठिन है।

वैसे आत्मा की अभिव्यक्ति ह्दय में होती है अर्थात आत्मा का केन्द्र ह्दय में होता है , लेकिन वास्तव में आत्मा की पीठ ऊपर है जिसे हम सर्व शक्तिमान परमात्मा ,,सदा शिव, कहते हैं । जिस नाम से भी भगवान को बुलाया जाता है, बुलाते हैं।  

कुण्डलिनी के सहस्रार में प्रवेश में एकादश रुद्र सबसे बडी समस्या है । यह समस्या भवसागर से आती है, इस प्रकार यह तालू क्षेत्र में भी प्रवेश करती है। सहस्रार का अर्थ है.. =हजार, अनंत, असंख्य । इन सब चक्रों के ऊपर, महाचक्र है,जिसे सहस्रार के नाम से जाना जाता है। 

हजार दलों वालें महापद्म पर,जिसे साधना ही महासाधना है ;वही सत्यलोक है। अमरत्व, मुक्ति,निर्वाण सब कुछ वहीं पहुचने पर है। सारी तैयारी उसी की साधना की है। मनुष्य शरीर के कपाल के उर्ध्व भाग में स्थित सहस्रार चक्र के बारे सिद्धान्त गुरुजी कहते हैं कि ।

“विद्युतधारा की तरह इन छह चक्रों से होती हुई, ऊपर सहस्रार कमल में तुम जा विराजती हो । सूर्य, चन्द्र और अग्नि (इड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना) तुम्हारी कला पर आश्रित हैं | मायातीत जो परात्पर महापुरुष हैं, तुम्हारी ही आनंद लहरी में स्नान करते हैं” ।

सहस्रार पर पहुंचने पर साधक निवर्विचार हो जाता है और कोई स्वर नहीं निकलता है | ह्दय में शुद्ध स्पंदनहोता है-लप-टप-लप- टप। ये सारे स्वर एकत्रित होकर इस समन्वय से उत्पन्न होने वाला स्वर ओं …होता है। सूर्य के सातों रंग अंततः सफेद किरणें बन जाती हैं या स्वर्णिम रंग की किरणें ।

ह्दय सात चक्रों के सात परिमलों से घिरा हुआ है और इसके अन्दर आत्मा निवास करती है। आपके सिर के शिखर पर सर्व शक्तिमान सदाशिव निवास करते हैं । कुण्डलिनी जब इस विन्दु को छूती है तो आपकी आत्मा प्रसारित होने लगती और आपके मध्य नाडी तन्त्र पर कार्य करने लगती है ।

क्योंकि स्वतःचैतन्य लहरियॉ /वाइब्रेशन्स आपके मस्तिष्क में प्रवाहित होने लगती है। और आपकी नाडियों को ज्योतिर्मय करती है। परन्तु अभी भी ह्दय में पहचान नहीं आई लेकिन आप शीतल लहरियॉ महसूस करने लगते हैं। आप उस स्थिति में आप लोगों को रोग मुक्त कर सकते हैं ।

तथा और भी बहुत से कार्य कर सकते हैं। परन्तु अभी भी यह पहचान नहीं है क्योंकि पहचान आपके ह्दय की मानसिक गतिविधि है । आपको याद रखना होगा कि ह्दय पूरी तरह से मस्तिष्क से जुडा हुआ है, ह्दय जब रुक जाता है तो मस्तिष्क भी रुक जाता है।

सारा शरीर बेकार हो जाता है। कोई खतरा दिखने लगता है कि ह्दय धडकने लगता है। आपके ह्दय में जब दिव्यत्व और आध्यात्मिकता का अनुभव विकसित होने लगता है तब आप जान पाते हैं कि आप दिव्य व्यक्ति हैं। और जब तक आप पूर्ण रूपेण विश्वस्त नहीं होते कि आप दिव्य व्यक्ति हैं।

तो चाहे जितनी क्षद्धा आपमें हो यह पहचान अधूरी है। हम जब भी और जहॉ भी विद्युत चुम्बकीय शक्ति को कार्य करते हुये देखते हैं तो यह हनुमान जी के आशीर्वाद से होता है। वे ही विद्युत चुम्बकीय शक्तियों का सृजन करते हैं । श्री गणेश जी मूलाधार चक्र पर विराजमान हैं ।

श्री गणेश जी के अन्दर चुम्बकीय शक्तियॉ हैं । पदार्थ की अवस्था में वे मस्तिष्क तक जाते हैं । मस्तिष्क के विभिन्न पक्षों में सह सम्बंधों का सृजन करते हैं। अतः गणेश जी हमें बुद्धि प्रदान करते हैं तो श्री हनुमान हमें सद्विवेक प्रदान करते हैं ।

क्योंकि कुण्डलिनी गौरी शक्ति है और गणेश जी हर क्षण उनकी रक्षा करने के लिए वहॉ होते हैं, इतना ही नहीं,बल्कि कुण्डलिनी के चक्र भेदन करने के बाद श्री गणेश उस चक्र को बन्द कर देते हैं। ताकि कुण्लिनी फिर नीचे न चली जाय। 

शिव आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं और आत्मा का निवास आपके ह्दय में है। वास्तव में, सदा शिव का स्थान आपके सिर के शिखर पर है परन्तु वे आपके ह्दय में प्रतिविम्बित होते हैं। आपका मस्तिष्क विठ्ठल है अथार्त हरिहर । पूरी साधना हरिहर को समझने की ही है।

हरि माया का प्रतिनिधित्व करते हैं और हर आत्मा का। जब तक दोनों मस्तिष्क और आत्मा में यह वाइब्रेशन नहीं पहुंचता ,हमारी साधना का लक्ष्य भी पूरा नहीं होता। आत्मा को आपके मस्तिष्क में लाने का अर्थ आपके मस्तिष्क का ज्योतिर्मय होना है।

अर्थात परमात्मा का साक्षात्कार करने की आपके मस्तिष्क की सीमित क्षमता का असीमित बनना है। जब आत्मा मस्तिष्क में आती है तो आप जीवन्त चीजों का सृजन करते हैं..मृत भी जीवित की तरह से व्यवहार करने लगता है।

सहस्रार चक्र में ‘अ’ से ‘क्ष’ तक की सभी स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती है। पिट्यूटी और पीनियल ग्रंथि का आंशिक भाग इसमें संबंधित है। यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा और दाईं आंख को नियंत्रित करता है। यह आत्म दर्शन, एकीकरण, स्वर्गीय अनुभूति के विकास का मनोवैज्ञानिक केंद्र है। 

सहस्रार को कैलास में इंगित भगवान शंकर के तप रत होने की स्थिति को भी कहते हैं। सहस्रार चक्र दोनों कनपटियों से दो-दो इंच अंदर और भौहों से भी लगभग तीन-तीन इंच अंदर मस्तिष्क मध्य में महावीर नामक महारुद्र के ऊपर छोटे से पोले भाग में ज्योतिपुंज के रूप में अवस्थित है। 

गुरुजी के अनुसार यह छोटे उलटे कटोरे के समान दिखाई देता है। सहस्रार को जागृत कर लेने वाला व्यक्ति संपूर्ण भौतिक विज्ञान की सिद्धियां हस्तगत कर लेता है। यही वह शक्ति केंद्र है जहां से मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण करता है। 

और विश्व में जो कुछ भी मानव-हित के लिए विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है उस का संपादन करता है। इसे ही दिव्य दृष्टि का स्थान कहते है। मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक सभी चक्रों के जागरण की कुंजी सहस्रार चक्र के पास ही है ... यही सारे चक्रों का मास्टर स्विच है।

Comments

Popular posts from this blog

किडणी स्टोन व घरगुती

Advance Stemcell Benefits

आयुर्वेदिक काय काम करत