प्राकृतिक चिकित्सा नेचुरोपैधी / naturopathy भाग 1

प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैधी / naturopathy) एक चिकित्सा-दर्शन है। भाग 1
इसके अन्तर्गत रोगों का उपचार व स्वास्थ्य-लाभ का आधार है - 'रोगाणुओं से लड़ने की शरीर की स्वाभाविक शकि्त। प्राकृतिक चिकित्सा के अन्तर्गत अनेक पद्धतियां हैं जैसे जल चिकित्सा, होमियोपैथी, सूर्य चिकित्सा, एक्यूपंक्चर, एक्यूप्रेशर, मृदा चिकित्सा आदि प्राकृतिक चिकित्सा के प्रचलन में विश्व की कई चिकित्सा पद्धतियों का योगदान है जैसे भारत का आयुर्वेद तथा यूरोप का 'नेचर क्योर ।

प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली चिकित्सा की एक रचनात्मक विधि है, जिसका लक्ष्य प्रकृति में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध तत्त्वों के उचित इस्तेमाल द्वारा रोग का मूल कारण समाप्त करना है। यह न केवल एक चिकित्सा पद्धति है बलि्क मानव शरीर में उपसि्थत आंतरिक महत्त्वपूर्ण शकि्तयों या प्राकृतिक तत्त्वों के अनुरूप एक जीवन-शैली है। यह जीवन कला तथा विज्ञान में एक संपूर्ण क्रांति है।

इस प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में प्राकृतिक भोजन, विशेषकर ताजे फल तथा कच्ची व हलकी पकी सबि्जयाँ विभिन्न बीमारियों के इलाज में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा निर्धन व्यकि्तयों एवं गरीब देशों के लिये विशेष रूप से वरदान है।

विदेशो मैं विकास
भारत में प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति का जन्म हुआ। तथा इसकी उपयोगिता की महत्ता भी भारत में अति प्राचीन समय चली आ रही है। जिन-2 स्वास्थ्य सम्बन्धी प्राकृतिक कि्रयाओं का हम प्रयोग कर रहे हैं वे सभी उपचार की पद्धतियां पूर्वावस्था में प्राचीन भारत में विद्यमान थी। भारत में ही रोग निवारण के लिए इस पद्धति का प्रयोग नहीं किया वरन अन्य कई देशों में भी इस पद्धति का प्रयोग आज किया जा रहा है। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति भारत की ही देन है परन्तु कुछ कारणों तथा अन्य विकासों के प्रभावानुसार यह पद्धति भारत में लुप्त हो गई। इसके बाद इसके पुनः निर्माण का श्रेय विदेशों (पाश्चातय देशों) को ही है।

ईसा से कई सौ वर्ष पूर्व ही हिपोक्रेटीज ने प्राकृतिक चिकित्सा का पुनः पुनरूथान किया। इसी कारण इन्हें 'चिकित्सा का जनक' कहते है। 18वीं शताब्दी के मध्य से कछ लोगों के प्रयास के फलस्वरूप प्राकृतिक चिकित्सा का प्रारम्भ तथा विकास फिर शुरू होने लगा तथा हम इस चिकित्सा को पुनः जानने लगे। इस पद्धति के पुनरूथान में जिन महान और प्रभावशाली व्यकि्तयों का योगदान है वह पहले से ही रोगों को ही उपचार के लिए औषधियों का प्रयोग करते थे परन्तु औषधियों के प्रयोग के बाद भी रोगों पर सफलता न पा सकने तथा उसके प्रतिकुल प्रभावों को जानने के बाद और स्वयं पर भी औषधि चिकित्सा की प्रणाली के कटफल चखने के बाद प्राकृतिक चिकित्सा की शरण ग्रहण कर स्वस्थ जीवन जीने लगे। इन्होने इस पद्धति के चमत्कारों से प्रभावित होने के कारण इस पद्धति के प्रचार-प्रसार और विकास में लग कर प्राकतिक चिकित्सा को नया जन्म दिया

जेम्स क्यूरी और सर जॉन फ्लायर


डॉ फ्लायर (Sir John Floyer) इंग्लैड के लिचफील्ड नगर के निवासी थे। लिचफील्ड के एक सोते के पानी में कुछ किसानों को नहाकर स्वास्थ्य लाभ करते देख उन्हे जल के स्वास्थ्यवर्द्धक प्रभाव के सम्बन्ध में अधिकाधिक जांच पडताल करने की प्रबल इच्छा हई। इसके कारण उनका रूझान इस पद्धति की ओर हुआ।

डॉ जेम्स क्यूरी (James Currie) लिवरपुल के रहने वाले थे सन् 1717 ई. को लगभग इन्होने एक जल चिकित्सा सम्बनि्धत पुस्तक लिखकर उसका प्रकाश कराया।

लुई कूने

डॉ लूई कुने (Louis Kuhne) एक प्रसिद्ध चिकित्सक के रूप में जाने जाते है। इनका जन्म 1844 में जर्मनी में हुआ। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली को विषेशकर जल चिकित्सा को उन्नति के शिखर तक पहुंचाने के लिए जीवन का अधिकांश समय दिया इसके साथ ही उन्होने दो महत्वपूर्ण पुस्तकें "The new science of Healing तथा "The science of facial Expression* लिखी !

इन्होने रोग के कारण और उपचार पर जोर देते हए चिकित्सा प्रारम्भ की और अन्ततः लिपजिंग (Leipzig) नगर में अपना एक चिकित्सालय भी स्थापित किया । जल चिकित्सा में प्रयोग होने वाले उपकरणों की डिजाइनिंग करके हिप बाथ आदि की शुरूआत में महत्वपूर्ण योगदान दिया जो आज भी प्राकृतिक चिकित्सा में उनके नाम से प्रसिद्ध है (जैसे मेहन स्नान को लूई कूने नाम से ही जाना जाता है। ) उन्होने विजातीय द्रव्य के पनपते की और उसके विभिन्न स्थानों पर जमा होने पर विस्तृत रूपरेखा तैयार की।

आपका जन्म एक जुलाहे परिवार में हआ था। लेकिन इन्हे कर्ड दर्दनाक परिसि्थतियों का सामना करना पडा। माता-पिता के आकास्मक निथन व अपने शरीर के असाध्य फोडों के कारण औषधिविज्ञान के चिकित्सकों के द्वारा हतोत्साहित होना पडा। इसी कारण उन्हे अपने लिए किसी सुदढ चिकित्सा प्रणाली की आवश्यकता हुई और प्राकृतिक चिकित्सा की शरण ले स्वास्थ्य को प्राप्त करने में सफल भी हो गए।

विन्सेंज पि्रसि्नज

विन्सेंज पि्रसि्नज (Vincenz Priessnitz) जन्म सन् 1799 में आस्ट्रेलिया में हुआ। इनको जल चिकित्सा का जनक कहा जाता है। इन्होने प्राकृतिक चिकित्सा में आने से पूर्व एक घायल देखा जो बार-2 अपने उस घाव को लेकर पानी के तलाब में लेंटता था। ऐसा कुछ दिनों करने पर उसका घाव पूरी तरह ठीक हो गया था इसे देखकर उन्होने कई प्रयोग करे परन्तु इन प्रयोगों के करने के कारण उनको न्यायालय में भी उपसि्थत होना पड़ा परन्तु अन्ततः न्यायालय द्वारा इस पद्धति को हितकारी मानते हुए न्यायालय द्वारा उनके हित में ही फैसला सुनाया गया। इसके पश्चात उन्होने प्राकृतिक चिकित्सा का खुलकर उपचार अपने घर पर ही देना शुरू किया। प्राकतिक चिकित्सा के क्षेत्र में उनका विरोध होने पर भी बिना डरे उन्होने अपने पूरे विश्वास और लगन से इसके अनेकों चमत्कार किए तथा पूरी दुनिया द्वारा भी माने गए।
डॉ• इसाक जेनिंग

औषधि विज्ञान के डॉक्टर के रूप में पहचाने जाने वाले डॉ• जेनिंग (Dr. Isaac Jenning) अमेरिका में 1788 में पैदा हए और उन्होने प्रकृति एवं सफाई को अधिक महत्व देते हए एक बुखार के रोगी को उपवास, विश्राम और अत्यधिक पानी के सेवन के साथ शान्त वातावरण में रहने की सलाह दी इस

प्रकार वह अन्य दुसरे रोगों में एक टाइफाइड के रोगी को जिस पर दवाओं का कोई असर नहीं हो रहा था का प्राकृतिक उपचार किया। जिससे रोगी की सि्थति में सुधार होने लगा। सन 1822 में उन्होने पूरी तरह से दवाओं का प्रयोग बन्द कर दिया और प्राकृतिक चिकित्सा करने लगे। इसका प्रयोग करने से रोगियों की मृत्युदर में गिरावट आने पर चमत्कारी प्रभाव सामने आने लगे। तथा स्वस्थ होने में भी परिणाम शीघ्र प्राप्त होने लगे। इससे उन्होने निष्कर्ष निकाला की रोग बाहरी वातावरण की नहीं वरन जीवनी शकि्त के द्वास की देन है उनकी उपचार पद्धति को आर्थोपैथी के नाम से जाना जाता है। इन्होने तीन किताबें लिखी "The medicial reform, "Philosophy of human life" a "The tree of human life as human degeneracy है . 

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